मैं, उलझा हूँ रिश्तों मे सुलझा रहा उलझन, जैसे जी रहा हूँ दर्द क्या है? ग़म क्या है, चाहता क्या हूँ? जवाब ढूंढ रहा, जैसे सांस भर रहा हूँ . राहे संकरी काटो भरी दर्द से कर ली अब मैंने भी यारी सोच भी असमानों सी अनंत है चल रहा हूँ, जैसे राहे मखमली .ContinueContinue reading “संघर्ष”
